रचना चोरों की शामत

Saturday, 6 September 2014

आओ मित्रों पेड़ बचाएँ



वन-वन को अतिक्रमण खा रहा
फैल रहीं विषयुक्त हवाएँ।
है उदास, सहमा सा मौसम
आओ मित्रों पेड़  
बचाएँ।
 
काँप रहे हैं बरगद पीपल
अमलतास का टूटा है बल।
गुलमोहर की बाहें बेदम
होकर ढूँढ रही हैं संबल।
 
हम इनको दुलराएँ चलकर
आँसू पोंछें धैर्य
बँधाएँ।
 
करें इस तरह कुछ तैयारी
पास न पहुँचे इनके आरी।
कातिल नज़र पड़े जो इनपर
बन जाएँ तलवार दुधारी।
 
करके रक्षित इन्हें आज हम
पर्यावरण विशुद्ध   
बनाएँ।   
 
वन करते लाखों का पोषण
रोकें अब हम उनका शोषण
जन-जन मन के भाव जगाकर
एक मंत्र दें, पौधारोपण।

अभी समय है मिलकर मित्रो
हरियाली से धरा  
सजाएँ

- कल्पना रामानी

2 comments:

Brijesh Neeraj said...

बहुत सुन्दर नवगीत!

sharda monga (aroma) said...

Very nice..

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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