रचना चोरों की शामत

Thursday, 3 October 2013

कल्पना रामानी एक जीता जागता चमत्कार--पूर्णिमा वर्मन//समीक्षा-"हौसलों के पंख"


कल्पना रामानी जी इंटरनेट और वेब का एक जीता जागता चमत्कार हैं। अगर इंटरनेट न होता तो हम इस चमत्कार से वंचित रह जाते। एक ऐसा चमत्कार  जो देखते ही देखते एक सामान्य गृहणी को जानी-मानी रचनाकार के रूप में हम सबके सामने प्रकट कर दे। ऐसा कहना उनके अपने श्रम को नकारना नहीं है, बेशक उनमें प्रतिभा, लगन और मेधा का बीज कहीं छुपा था जो इंटरनेट की विभिन्न धाराओं से सिंचकर पल्लवित हो गया।
अभी कल की ही बात थी कि फेसबुक पर उनसे परिचय हुआ था। भोली-भाली, सीधी-साधी महिला, कविता में रुचि रखने वाली कुछ न कुछ लिखने वाली और पूरी तरह से अनाश्वस्त कि जो लिख रही हैं वह कैसा है, लेकिन साल बीतते न बीतते वे कविता की तमाम विधाओं को पूरी आश्वस्ति से समझने लगी थीं। हमारे अभिव्यक्ति के फेसबुक समूह और नवगीत की पाठशाला में उन जैसा मेधावी कोई सदस्य नहीं। जिस तेजी से उन्होंने छंद और लय को समझा, आत्मसात किया और कविताओं में रचा, वह आश्चर्य चकित कर देने वाला था। गीत, दोहे, कुंडलिया और फिर गजल वे हर विधा की बारीकियों में निष्णात होती चली गईं।
आज वे अभिव्यक्ति एवं अनुभूति के संपादक मंडल का हिस्सा हैं और उनके हौसलों की उड़ान देश विदेश में पहुँच जाने वाली है। उनके शिल्प और संवेदना पर बहुत कहने की आवश्यकता नहीं क्यों कि वह आपके हाथों में है। रचना का जादू मन मोहे तो फिर कहने को कुछ बचता नहीं। उनका सान्निध्य अपने आप में एक उपहार है। उनकी रचनाओं के द्वारा यह उपहार सभी पाठकों तक पहुँचे। यह जादू बना रहे और नये नये चमत्कार हमें देखने को मिलें यही मंगलकामना है।
पूर्णिमा वर्मन
संपादक अभिव्यक्ति / अनुभूति

3 comments:

shashi purwar said...
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shashi purwar said...

पूर्णिमा दी ने सत्य कहा है दीदी , आपके इस सफ़र के हम साक्षी है ,शुरू से हमने आपको देखा है ,जिस लगन और मेहनत से आपने इतनी जल्दी यह मुकाम हासिल किया है वह सबके बस की बात नहीं है ,आप वह अनमोल हीरा है ,जिसकी चमक हमने करीब से देखी है और ख़ुशी महसूस भी की है . यह एक बड़ी सफलता है आपके जीवन की। आपको कोटि कोटि शुभकामनाये ,आप निरंतर प्रगति करें ,यही कामना है -- सस्नेह शशि

VIRESH ARORA said...

((( समीक्षा-"हौसलों के पंख" )))

"हौसलों के पंख" आदरणीय कल्पना रमानी जी का प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह होते हुए ही साहित्यिक ऊर्जा, काव्य शिल्प की सुघड़ता व विचारो की परिपक्वता से ओत-प्रोत है. कविताओं में भाषा की सरलता सरसता सहजता व हृदय ग्रहिता तो है ही, भावों की सौम्यता शुभ्रता भी पाठकों का मन मोह लेने में पूर्णतः सक्षम है. नारी कण्ठ की मधुरता होने के कारण "सोने में सुहागा" की उक्ति भी चरितार्थ होती है. इस संकलन में कल्पना जी की सबसे बड़ी विशेषता यह लगी कि विपरीत परिस्थितियों, विषम वातावरण व जीवन के उतार - चढ़ाव में जहाँ आम व्याक्ति उदास निराश व हताश हो जाता है वहीँ कल्पना जी ने अदबुध शौर्य व हिम्मत का परिचय दिया है, उनकी आशावादिता, शुभ संकल्पो के प्रति दृढ़ता का परिचय उनकी पहली रचना में ही पढ़ने को मिल गया - "हौसलो के पंख हो तो चिर विजय होगी " इसी रचना में वे आगे लिखती हैं कि - "मंजिलें पा ही लेंगें कार्यरत योगी" तथा "ठोस हों संकल्प तो साथ देगी हर लहर" कल्पना जी के इस संकलन कि रचनाओ में महिला शक्ति, अधिकार व स्वतंत्रता के साथ ही कन्या भ्रूण हत्या (अजन्मी बेटी) जैसे विषय पर सामाजिक सरोकार यत्र तत्र सर्वत्र मिलते हैं,वहीँ पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी स्पष्ट रूपेण दृष्टिगत होती है. सखी नीम तले, सावन (सावन का सत्कार), बसन्त (ऋतु बसन्त आई), बरसात (स्नेह सुधा बरसाओ मेघा), ग्रीष्म (गरम धूप में बचपन ढूंढे), पतझड़ व शीत ऋतु जैसी रचनाएं उनके प्रकृति प्रेम की बहुरंगता को दर्शाती है.बेटी तुम, अजन्मी बेटी, पापा तुम्हारे लिए, कहलाऊँ तेरा सपूत, नारी जहाँ सताई जाए, आज कि नारी, माँ के बाद व गितमान के मीट में नारी ह्रदय कि सहजता, सरलता व आत्मीयता अत्यंत अपनत्व सनी बन पड़ी है, वहीं कृतज्ञता की अभिव्यक्ति में " तुम्हे क्या दें गंगा माँ " शीर्षक रचना में क्या खूब लिखा है -" ऋणी रहेगा सदा तुम्हारा माटी के इस तन का कण कण ऐसा कुछ सद्ज्ञान हमें दो संस्कृति का फिर प्रकाश हो "


मद्य निषेध सजा पन्नो पर तथा "दीन देश कि यही त्रासदी " जैसी रचनाएं समाज में व्याप्त कुरूतियो पर कवियित्री की चिंता तथा समाज सुधार के लिए उनके नारी मन कि व्यग्रता दर्शाती है. मातृभाषा हिंदी के सम्बन्ध में लिखी गई रचना - " हस्ताक्षर हिन्दी के " व " हिन्दी कि मशाल " कि ये पंक्तिया तो कंठस्थ कर लेने जैसी है :-


"हिन्दी का इतिहास पुराना सकल विश्व ने भी माना शब्द शब्द में छिपा हुआ है संस्कृति का अनमोल खजाना"


" जय भारत माँ " शीर्षक वाली रचना उनके देश प्रेम / राष्ट्रीय भावनाओ को उजागर करता है वहीं वृक्षो की बिना सोचे समझे कटाई पर कवियित्री का भावुक मन जिस तरह वयथित हो जाता है उसे " करणी का फल धरणी देगी " शीर्षक कि रचना में देखा जा सकता है.


सभ्यता कि चकाचौंध में शहरों के आकर्षण व ग्रामो कि दुर्दशा के बारे में कितना सही लिखा है :-"भीड़ है पर है अकेला आदमी स्नेहवर्षा को तरसता आदमी "आज राजनीति के दुश्चक्र में सामान्य आदमी कि जो दुर्दशा हुई है और जन नेता जन-जन का जिस तरह शोषण कर रहे है उसे भी आपने बड़ी वेदना के साथ भावुक सब्दो से अपनी रचना में उकेरा है :" राजा बनकर रहे गावं में अब मजदूर शहर में रहने को मजबूर हो गए दड़बों जैसे घर में .....शोषित है अब जनता सारीकरुण कथा की किसे कहें ?जो समर्थ है वही लुटेरे हर सीमा को लाँघ रहे ...."


कुल मिलाकर कहा जा सकता है की कल्पना जी द्वारा रचित "हौसलों के पंख" समाज व वातावरण के विभिन्न आयामो को बड़ी कुशलता व कुशाग्रता से अभिव्यक्त कर रही है. वे इसी तरह अनवरत साहित्य सृजन करते हुई हिन्दी पाठको व कविता रसिकों कि आशा अपेक्षाएं पूर्ण करती रहेंगी इसी विश्वास के साथ ... शुभकामनाओं सहित ..


स्नेहाभिलाषी
वीरेश अरोड़ा "वीर"

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धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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