रचना चोरों की शामत

Monday, 7 October 2013

जीवन के विविध आयामों का भावनात्मक स्पर्श -समीक्षा / डॉ़ अमिताभ त्रिपाठी

     कल्पना जी के इस काव्य संग्रह का पाठ एवं अनुशीलन अनुभूति के कई आयाम खोलता है जो जीवन के लगभग सभी सन्दर्भों को कहीं न कहीं स्पर्श करते प्रतीत होते हैं। यह स्पर्श भावनात्मक तो है ही संवेदना के उदात्त स्तरों को भी रेखांकित करता है। साफ सुथरा छन्द विधान और सुगठित शब्दयोजना कल्पना जी के काव्य प्रतिभा के सुव्यक्त हस्ताक्षर हैं। इनके प्रवाह में लयभंगता नहीं आने पाती जो गीतिकाव्य का मुख्य तत्व है। आज के मुक्तछन्दानुरागी युग में यह बड़ी उपलब्धि भी है और योगदान भी।
गीतों में भाषा की दृष्टि से कल्पना जी ने सहजता का आश्रय लिया है। स्वाभाविक रूप से जो शब्द आ गये हैं उनके लिये तत्सम शब्दों को ढूँढने का प्रयत्न प्रायः नहीं दिखाई देता फलस्वरूप संस्कृत की प्रांज्जल शब्दावली के साथ बोल-चाल में प्रचिलित उर्दू, अरबी या फ़ारसी के शब्दों का भी प्रयोग सहजता से हुआ है। उदाहरण के लिये 'जोश की समिधा' हिन्दी में अभिनव प्रयोग है जिसे हो सकता है कुछ आलोचक ग्राह्य न मानें लेकिन यदि यह मनोभावों को सम्प्रेषित करने में सफल है तो अटपटा नहीं लगेगा।
    आरम्भ में अनन्त के विहार नामक रचना में पंचचामर छन्द का बड़ा ही सुन्दर और सार्थक प्रयोग हुआ है। इस छन्द को संस्कृत में बहुधा ओज प्रधान रचनाओं में प्रयोग किया गया है। सोलह वर्णों के इस वृत्त में लघु-गुरु का एकान्तर से प्रयोग होता है। जय शंकर प्रसाद ने चन्द्रगुप्त नाटक के प्रसिद्ध गीत में भी इसका प्रयोग किया है -

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वंयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती

और रावण के नाम से प्रसिद्ध शिव ताण्डव स्तोत्र भी इसी छन्द में है -

जटाटवीगलज्जलप्रवाह पावितस्थले
गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्

कल्पना जी की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं -

विशाल व्योम ने रची, सुदर्श रास रंग की
जिया प्रसन्न हो उठा, फुहार से उमंग की
मयूर मस्त नृत्य में, किलोलते कतार में
अमोघ भेघ गीतिका, सुना रहे मल्हार में

यद्यपि यह वार्णिक वृत्त है लेकिन मात्रिक दृष्टि से उर्दू के बह्रे-हजज की एक मुजाहि़फ सूरज (मफ़ाइलुन ४) से मेल खाता है।
‘जिया प्रसन्न हो उठा' में देशज प्रयोग भी रेखांकित करने योग्य है।
संग्रह का आरम्भ जिस गीत से हुआ है वह शीर्षक गीत है और यहीं से हौसलों के पंख पर सवार होकर कल्पना जी ने जो गीत-यात्रा प्रारम्भ की है वह मौसमों के छन्द बिखेरती हुई, नवगीतों के विभिन्न वर्णी मेघों से होती हुई और चिन्तन के अलग-अलग शिखरों का आलिंगन करती  हुई पलाश को संबोधन से समाप्त होती है। कल्पना जी सामाजिक सरोकारों के प्रति बहुत संवेदनशील हैं जो बार-बार उनके नवगीतों में प्रतिभाषित होता है चाहे वह पर्यावरण हो, कन्या भ्रूण हत्या हो या महिलाओं के अधिकार और उनकी स्वतंत्रता की बात हो वे मुखरता से अपना पक्ष रखती हैं। आशा, विश्वास और हौसला ये उनके गीतों के प्रमुख तत्व हैं जो विभिन्न रूपों में और कभी-कभी समान शब्दों में बार-बार उच्चारित होते हैं और उद्घोषित होते हैं।
 यही उनके कवि की रचनात्मक उर्जा और भविष्य के प्रति शुभ संकल्पों के प्रतिदर्श भी हैं। कल्पना जी का उद्यपि यह प्रथम काव्य संग्रह है और प्राप्त सूचनाओं के अनुसार उन्होंने वयःसन्धि पार करने के उपरान्त बहुत बाद में सर्जना के क्षेत्र में पदार्पण किया है, उनकी रचनाओं में पर्याप्त प्रौढ़ता, सुघड़ता, वैचारिक स्पष्टता और शिल्पगत सौम्यता दृष्टिगत होती है जो किसी पूर्व सिद्धि का संकेत करती है।
  मुझे कल्पना जी की रचनाओं ने बहुत प्रभावित किया है। इन्हें पढ़ना नवगीतों के उद्यान में एक फेरा लगाने जैसा अनुभव था। मेरी शुभकामनायें और बधाई दोनों ही रचनाकार के प्रति हैं।

- डॉ़ अमिताभ त्रिपाठी इलाहाबाद

1 comment:

राकेश कौशिक said...

हार्दिक बधाई

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