रचना चोरों की शामत

Thursday, 13 March 2014

आइये होली खेलें







पुनः प्रेम के साथ पाहुना
फागुन लाया।
रंग कलश भर लाल
आइये होली खेलें।

कोयलिया की
कूक छा गई कुंज बनन में।
पायलिया हर
पाँव बंध गई घर आँगन में।
लदी बौर से
डाल आम्र तरु की बागन में।
मूक हुए वाचाल
आइये होली खेलें।

फूल-फूल ने
जल में आकर डुबकी मारी।
लाल लाल हुई
फुलबगिया की क्यारी-क्यारी।
लगे फूटने
गुब्बारे, तन गई पिचकारी।
झूमें जन बिन ताल
आइये होली खेलें।

क्या खुमार है
खूब! युवाओं पर मौसम का।
सारा आलम
भाँग घोटने  आकर धमका।
सुर सरगम पर
पग पग बहका, घुँघरू खनका।
मन भर उड़ा गुलाल
आइये होली खेलें।

-कल्पना रामानी

4 comments:

अभिषेक कुमार अभी said...

आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
--
आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (03-03-2014) को ''होली आई रे आई होली आई रे '' (चर्चा मंच-1554) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर…!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
रंगों के पावन पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Neeraj Kumar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .. .. आपको होली की हार्दिक शुभकामनायें ..

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर
होली की हार्दिक शुभकामनाऐं ।
new post: ... कि आज होली है !

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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