रचना चोरों की शामत

Saturday, 21 July 2012

कागा रे! मुंडेर छोड़ दे...














कागा रे!
मुंडेर छोड़ दे
मत मेहमान पुकार।

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली
चढ़ी चौके दाल पनीली।
शेष नहीं मुट्ठी भर आटा
औंधे सोए तवा
पतीली।

क्या खाएगा प्रियम पाहुना
कुछ कर सोच-विचार।
 
एक कोठरी दस बाशिंदे
मैला बिस्तर, चिंदे चिंदे।
पलक बंद नहिं होती पल भर।
चर्म चाटते मुए
पतंगे।

मच्छर चखते रक्त,रेंगते
खटमल बना
कतार।
 
काँव काँव की टेर छोड़ दे
इस घर से यह चोंच मोड़ दे
नहीं चाहती द्वारे आकार
आगत अपने पाँव  
मोड़ दे।

काग सयाने,तू क्या जाने।
दीनों के संस्कार।

-कल्पना रामानी

1 comment:

वीरेश अरोड़ा "वीर" said...

चूल्हा ठंडा, लकड़ी सीली,

चढ़ी न चौके दाल पनीली।

शेष नहीं मुट्ठी भर आटा,

औंधे सोए तवा पतीली।

क्या खाएगा प्रियम पाहुना,

कुछ तो करो विचार।......................

काग सयाने,तुम क्या जानो।


दीनों के संस्कार.............बहुत मार्मिक .........सुंदर गीत बधाई कल्पना जी

पुनः पधारिए


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--कल्पना रामानी

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