रचना चोरों की शामत

Wednesday, 18 July 2012

पूछ रहा है प्रश्न देश



पूछ रहा है प्रश्न देश यह
अपने सुपर सपूतों से।

कहते थे सोने की चिड़िया
क्या यह  अपना देश वही?
कदम कदम रोटी होती थी
हर पग पर था नीर यहीं।
क्षीर नदी बहती थी तब,अब
बूँदें दिखतीं शेष नहीं।

किसने लूटा वसुधा को इन
काली खल करतूतों से।

क्या यह वही धरा है, जो थी
जीवन से भरपूर कभी? 
अत्याचारों की आँधी में
खो बैठी है नूर यही।
वेधित हुई है विपदाओं से
तप तप कर तंदूर हुई।

अब क्या बची रहेगी दुनिया
प्रलयंकारी दूतों से?

हथगोले से प्रश्न अनगिने 
उत्तर बगलें झाँक रहे।
बहसों की बारिश में भीगे
सभी सूरमा हाँफ रहे।
चित पट में खोए हल सारे
जनता के मन काँप रहे।

क्या राहत मिल पाएगी अब
कुदरत को इन पूतों से?


-कल्पना रामानी

5 comments:

राजेश कुमार झा said...

कल्‍पना दी बहुत ही अच्‍छा लिखा है,पूरे गीत में कहीं भी न गति भंग होती है ना ही यति, अंतिम पैरा तो बेहतरीन है 'हथगोले से प्रश्न अनेकों/उत्तर बगलें झाँक रहे' ये पंक्तियां अमूल्‍य है एवं किसी भी कवि की चाहत होती है ऐसा लिखने का, सादर

वीरेश अरोड़ा "वीर" said...

बहुत खूब कल्पना जी .... बहुत बधाई. आपके ब्लॉग का आज ही पता चला. मुझे आपकी हर विधा की रचना पसंद है.

ज्योति खरे said...

सपूतों को समर्पित सार्थक रचना बधाई

कल्पना रामानी said...
This comment has been removed by the author.
गीता पंडित said...

वाह.... वाह....
बधाई कल्पना जी ..
निरंतर अच्छा लिखती जा रही है आपकी लेखनी...

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

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