रचना चोरों की शामत

मेरे बारे में

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कल्पना रामानी
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Sunday, 14 December 2014

धूप सखी है विनती मेरी



धूप, सखी! है विनती मेरी
कुछ दिन जाकर शहर बिताना
पुत्र गया धन वहाँ कमाने,
जाकर उसका तन सहलाना।

वहाँ शीत पड़ती है भारी।
कोहरा करता चौकीदारी।
तुम सूरज की परम प्रिया हो
रख लेगा वो बात तुम्हारी।

दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर
उसे प्रेम से गले लगाना।

रात, नींद जब आती होगी
साँकल शीत बजाती होगी
चुपके से दर-दीवारों पर
बर्फ हर्फ लिख जाती होगी। 
सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर
पुनः गाँव की याद दिलाना।

मैं दिन गिन-गिन जिया करूँगी।
इंतज़ार भी किया करूँगी।
अगर शीत ने मुझे सताया
फटी रजाई सिया करूँगी।

लेकिन यदि हो कष्ट उसे तो
सखी! साथ में लेती आना।  

-कल्पना रामानी  

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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