
मुश्किलों को मीत मानों
जीत तय होगी।
हौसलों को पंख दो तो
चिर विजय होगी।
उड़ रहे पंछी प्रवासी
अनवरत इक आस में।
लक्ष्य पाने चल पड़े हैं
फिर नए आकाश में।
साथ हैं बहती हवाएँ
और पंखों पर गुमान।
मंज़िलों को पा ही लेंगे
कर्म रत योगी।
हाथ में पतवार है तो
लाख फिर मँझधार हो।
तट बढ़ेगा थामने तुम
हौसलों को थाम लो।
ठोस हों संकल्प यदि तो
साथ देगी हर लहर।
जोश की समिधा में विपदा
हर विलय होगी।
फिर जनम लेते हैं अवसर
हों अगर सपने बड़े।
हौसलों के बल से निर्बल
लौ भी तूफाँ से लड़े।
हर अँधेरे में छिपी है
इक उजाले की किरण।
दृढ़ इरादे हों तो कुदरत
भी सदय होगी।
-कल्पना रामानी
6 comments:
bahut sundar navgeet hai didi , hardik badhai yah man ke bhav kahate haoslo ke pankh hai ,
वाह! कल्पना जी। बहुत सुंदर गीत है।
आपकी कविता सुंदर है. पर एक बात समझ में नहीं आई. यह कविता तुकांत है. फिर इसे पंक्तियाँ तोड़कर मुक्त छंद की तरह लिखने की क्यों जरूरत पड़ी.
है
कविता सुंदर.
Kavitaji
Aap bahut sunder likhatin hain.
Sorry Sir for interrupting.
A style of writing.
This is 'Navgeet'.
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