
ज़िक्र त्याग का हुआ जहाँ माँ!
नाम तुम्हारा चलकर
आया।
कैसे तुम्हें रचा विधना ने
इतना कोमल इतना स्नेहिल!
ऊर्जस्वित इस मुख के आगे
पूर्ण चंद्र भी लगता धूमिल।
क्षण भंगुर भव-भोग सकल माँ!
सुख अक्षुण्ण तुम्हारा
जाया।
दिया जलाया मंदिर-मंदिर
मान-मनौती की धर बाती।
जहाँ देखती पीर-पाँव तुम
दुआ माँगने नत हो जाती।
क्या-क्या सूत्र नहीं माँ तुमने
संतति पाने को
अपनाया।
गुण करते गुणगान तुम्हारा
तुमको लिख कवि होते गर्वित।
कविता खुद को धन्य समझती
माँ जब उसमें होती वर्णित।
उपकृत हर उपमान तुम्हीं से
हर उपमा ने तुमको
गाया।
चाह यही हर भाव हमारा
तव चरणों में ही अर्पण हो।
मातु! कलेजे के टुकड़ों को
टुकड़ा टुकड़ा हर इक गुण दो।
हम भी कुछ लौटाएँ तुमको
जो-जो हमने तुमसे
पाया।
-कल्पना रामानी
3 comments:
उपकृत हर उपमान तुम्हीं से
हर उपमा ने तुमको
गाया।
...सच कहा है..माँ अतुलनीय होती है..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...
बहुत ही भावपूर्ण एवं माँ को समर्पित रचना। स्वयं शून्य
वाह दीदी
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