रचना चोरों की शामत

Wednesday, 20 September 2017

बरखा रानी विदा हुई


संबंधित चित्र
बरखा रानी विदा हुई
दे नीर, समेट दुकूल।
मुखर हुआ माटी का कण-कण
खिले आस के फूल।

मानसून ने खूब दिया जल
सबको एक समान।
नदी, ताल, सागर, झरने या 
हों बंजर मैदान।

जलधाराएँ झूम रहीं हैं
किलक रहे हैं कूल।

भोर भिगोती हवा सुगंधित
शीतल हुई दुपहरी
खेत-वनों बागों में बिखरी
जीवन की स्वर लहरी

संध्या रानी बन दीवानी
झूल रही है झूल

मुखर हुईं गुपचुप कलियों से
भँवरों की मनुहारें
भिगो रही तितली-फूलों को
बतरस की बौछारें

प्रेम-प्रणय की पींगें भरता
मौसम है अनुकूल

-कल्पना रामानी

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

Followers

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"
संपर्क-अंजुमन प्रकाशन/ई मेल anjumanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब मेरी ओर से सिर्फ आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com-

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"
संपर्क-अयन प्रकाशन ई मेल-ayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"
संपर्क- अयन प्रकाशन-ई मेल ayanayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क -- kalpanasramani@gmail.com

मेरी प्रकाशित ई बुक

पुरस्कार/सम्मान

पुरस्कार/सम्मान
मेरे प्रथम नवगीत संग्रह "हौसलों के पंख" के लिए पूर्णिमा जी द्वारा नवांकुर पुरस्कार/सम्मान ग्रहण करते हुए