रचना चोरों की शामत

मेरे बारे में

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कल्पना रामानी

Friday, 30 March 2018

अग्नि बाण बरसे अम्बर से

गर्मी का मौसम के लिए इमेज परिणाम
अग्नि-बाण बरसे अम्बर से 
पर श्रम जीवन दौड़ रहा है

डटा हुआ है मंगलू मोची
घने पेड़ के छायाघर में  
आए आज शरण में इसकी    
ज़ख्मी जूते भर दुपहर में  

अर्द्ध-वसन खुद, लेकिन उनका
तन सीवन से जोड़ रहा है

देख घाट पर धरमू धोबी
ओसारे पर ननकू नाई
गुमटी पर गुरमुख पनवाड़ी
भट्टी पर हलकू हलवाई 

धूप हुई  हैरान, किस तरह 
पलटू पत्थर तोड़ रहा है

खेत हुए हैं रेत-रेत सब
सूरज ने अर्ज़ी लौटाई 
फरियादें जब रद्द हो गईं 
हर क्यारी जल-जल मुरझाई    

हलक खुश्क है पर हल लेकर 
हरिया गात निचोड़ रहा है    

-कल्पना रामानी

संध्या रानी जल्दी आओ

तपती धूप में चरवाहा के लिए इमेज परिणाम
दिनकर दीदे फाड़ तक रहा
संध्या रानी जल्दी आओ

मैं चरवाहा भटका दिन-भर
लेकिन छाँव न पाई पिन भर
आफताब यह बड़ा संगदिल 
दूर नहीं हटता है छिन-भर

हे देवी! है विनती तुमसे
निज छतरी में हमें छिपाओ

चाट गया जल, जलता तापक
घास चर गईं किरणें घातक  
जान हथेली लिए फिरेंगे
भूखे-प्यासे ढोर कहाँ तक?

कान बंद मत करो सुकन्या!
मानो बात रहम दिखलाओ

दहक रहे हैं दिन भट्टी बन 
भून रहे बेखता प्राण-तन 
खाल खींच खुशहाल हो रही 
रह-रह धूप हठीली बैरन     

ऐसे में हे साँझ-सयानी!
किसे पुकारूँ तुम्हीं बताओ  

-कल्पना रामानी

Wednesday, 20 September 2017

बरखा रानी विदा हुई


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बरखा रानी विदा हुई
दे नीर, समेट दुकूल।
मुखर हुआ माटी का कण-कण
खिले आस के फूल।

मानसून ने खूब दिया जल
सबको एक समान।
नदी, ताल, सागर, झरने या 
हों बंजर मैदान।

जलधाराएँ झूम रहीं हैं
किलक रहे हैं कूल।

भोर भिगोती हवा सुगंधित
शीतल हुई दुपहरी
खेत-वनों बागों में बिखरी
जीवन की स्वर लहरी

संध्या रानी बन दीवानी
झूल रही है झूल

मुखर हुईं गुपचुप कलियों से
भँवरों की मनुहारें
भिगो रही तितली-फूलों को
बतरस की बौछारें

प्रेम-प्रणय की पींगें भरता
मौसम है अनुकूल

-कल्पना रामानी

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धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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