सुबह-सुबह जब
चिड़ियाँ गातीं
हमें बुलाते बाग
बगीचे।
ले आता सूरज भी
अपनी
धवल धूप का सुंदर
टुकड़ा
साथ चमकता पथ जब
चलता
कुसुमाकर दिखता हर
मुखड़ा
नज़रों को देते
नज़राना
हरीतिमा से गुंथे
गलीचे।
दिन में तो लटकाए
रखते
ऊँचे खूँटे इमारतों के
गीत रचा करती तन्हाई
भूली बिसरी इबारतों
के
लेकिन खुशबू वाले कुछ पल
हाथ थाम ले जाते
नीचे।
शहरी जीवन ने कुछ छीना
तो कुछ-कुछ उपकार भी किए
सुख-सुविधाओं के कोटे से
बहुतेरे अधिकार भी दिये
पर मन सोचे, क्यों गाँवों का
रस निचोड़ ये गुलशन
सींचे।
-कल्पना रामानी
