रचना चोरों की शामत

Saturday, 7 September 2013

सुनो स्वदेश प्रेमियो















सुनो स्वदेश प्रेमियों, भुला न दो अतीत को।
बुझे कभी न वो दिया, जला गए शहीद जो।
 
लिखे अनेक पृष्ठ हैं, जवानियों के रक्त से।
कि पत्थरों पे लेख हैं, खुदे कठोर सत्य से।
मिटी नहीं कहानियाँ, सुभाष की, प्रताप की।
बची हुई निशानियाँ, अनेक इंकलाब की।
 
कि याद भक्ति भाव से, करो हरेक वीर को।
बुझे कभी न वो दिया, जला गए शहीद जो।
 
शहीद वे महान थे, ज़मीं पे आसमान थे।
फिरंगियों के काल थे, स्वराज के वितान थे।
लुटाए प्राण हर्ष से, कभी हटे न फर्ज़ से। 
किया विमुक्त देश को, हुए विमुक्त कर्ज़ से।
 
खो सदा सँभालके, जिहादियों की जीत को।
बुझे कभी न वो दिया, जला गए शहीद जो।
 
अनेक वर्ष हो चुके, स्वतन्त्रता मिले हुए।
अपूर्ण हैं प्रयत्न वे, तरक्कियों के जो हुए।
सुकर्म के सुलेख से, लिखो कथा विकास की।
करो कठोर साधना, सुना रही नई सदी।

हुई अशेष दासता, न आए आज मीत वो।
बुझे कभी न वो दिया, जला गए शहीद जो।

-कल्पना रामानी

5 comments:

अरुन शर्मा अनन्त said...

शहीदों को समर्पित बहुत ही सुन्दर नवगीत रचा है आपने आदरणीया साथ ही साथ एक सन्देश भी दिया है आपने बहुत बहुत बधाई आपको. शहीदों को सत सत नमन

अभिषेक कुमार अभी said...

आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
--
आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (24-03-2014) को ''लेख़न की अलग अलग विद्याएँ'' (चर्चा मंच-1561) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर…!

अभिषेक कुमार अभी said...
This comment has been removed by the author.
Digamber Naswa said...

अनेक वर्ष हो चुके, स्वतन्त्रता मिले हुए
अपूर्ण हैं प्रयत्न वे, तरक्कियों के जो हुए ...
अभी तो और भी प्रयत्न करने होने तभी शहीदों कि आत्मा को शान्ति मिलेगी ...

Kailash Sharma said...

बहुत ही प्रभावी और समसामयिक अभिव्यक्ति...

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

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