रचना चोरों की शामत

Friday, 9 January 2015

आँगन की तुलसी

 
बढ़े धूप के तेवर रूठी
आँगन की तुलसी

सींच पाई गृहिणी उसको
जल का था टोटा
कोने में चुपचाप पड़ा था
मैला सा लोटा
ऊपर से गर्मी का भारी
आन पड़ा सोटा
मुरझाई बिन पानी प्यासी
पावन सी तुलसी

छाया वाले छप्पर में भी
छिद्रों का था जाल 
सूरज तपकर पहुँचा सिर पर
बना काल तत्काल
लड़े अंत तक कोमल पत्ते
सूख हुए कंकाल
दम टूटा पतझड़ में बदली
सावन सी तुलसी

सूखी तुलसी लेकिन उसके
बीज सदैव  हरे
फिर से नव अंकुर फूटेंगे
जब जल बूँद गिरे
गृहिणी के भी दिन बदलेंगे
जैसे समय फिरे
लहराएगी फिर ममता के
दामन सी तुलसी

-कल्पना रामानी 

3 comments:

jagdishpankaj said...

तुलसी के माध्यम से गर्मी के मौसम की सफल अभिव्यक्ति। सुन्दर रचना। -जगदीश पंकज

surenderpal vaidya said...

वाह, बहुत सुन्दर और सार्थक।

Ajay Manav Merchant said...

अति सुन्दर

पुनः पधारिए


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धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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