रचना चोरों की शामत

Wednesday, 29 January 2014

यह घर है दिलबरों का
















यह घर हमारा रहबर,
इस घर के हम सिकंदर,
यह घर है रहबरों का,
यह घर है दिलबरों का।
 
बचपन की बाँसुरी है,
यौवन की माधुरी।   
बंधन के बाँध इसमें,
स्वाधीन साँस भी।
गम हो खुशी हो चाहे,
हमदम सदा यही।
     
साथी है सहचरों का,
यह घर है दिलबरों का। 
 
हर दिन की शाम है ये,
हर रात की सहर।  
प्यारा सा आशियाना,
सपनों का हमसफर।
हर रस का स्वाद इसमें,
सेहत का राज़ घर,
 
संगीत सब सुरों का,
यह घर है दिलबरों का।
 
पुरखों की ये निशानी,
बरसों की दास्ताँ।
इतिहास की कहानी,
संघर्ष का निशां।
कृतिलेख है ये कल का,    
है आज का बयाँ।  
 
है द्वार मंदिरों का,
यह घर है दिलबरों का।


----कल्पना रामानी

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने..

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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