रचना चोरों की शामत

Saturday, 8 February 2014

देवता जागे















देवता जागे, सजे मंडप, बजीं
शहनाइयाँ।

झिलमिलाते वस्त्र, आभूषण
निकल बाज़ार से,
चल पड़े हैं तन सजाने वर-वधू
का प्यार से।
प्रेम का ले रंग उभरेगी
हथेली पर, हिना।
हँस रही हल्दी, शगुन पूरा
नहीं उसके बिना।
सात फेरे फिर रहे, लेते हुए
अँगड़ाइयाँ।

हो रहे दूल्हे विकल, सेहरे
सजाकर शीश पर,
दंग दर्पण तक रहा है दुल्हनों
को भर नज़र।
चल पड़े हैं बैंड-बाजे, संग
बाराती स्वजन।
भाँवरों के साथ होगा, वर-वधू
का चिर मिलन।
दूर होंगी दो दिलों को दूर
करती खाइयाँ।

स्नेह-मय सहभोज, न्यौते, भव्य
आयोजन सभी,
आदि से कायम प्रथाएँ हैं
हमारे देश की।
ये नहीं केवल दिखावा, गूढ़तम
संस्कार हैं,
गाँठ रिश्तों की न हो ढीली, यही
बस सार है।
निहित हैं इन रीतियों में भावमय
गहराइयाँ।

-कल्पना रामानी 

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