रचना चोरों की शामत

Thursday, 20 February 2014

फिर बसंत आया

















रंग-रँगीले रथ पर चढ़कर।
रस-सुगंध की झोली भरकर। 
फिर बसंत आया।

आज नई फिर धूप खिली है।
दिशा दिशा उजली उजली है।
कुहरे वाली बीती बातें।
नया सूर्य, नव भोर मिली है।

नई इबारत फिर गढ़ने को   
परिवर्तन लाया।

डाल-डाल झूले इतराए
बाग-बाग अंबुआ बौराए। 
प्रेम-प्रणय के रसित सुरों में
कोयल मुग्धा शोर मचाए। 

मृदुल तान मृदु साज़ छेड़कर
कुंज-कुंज गाया।

वन में पशु, वृक्षों का मेला।
देख विहग उमड़े पर फैला।
खुशबू, रंग, उमंगें पल-पल
बाँट रहा ऋतुराज नवेला।

विजन देश में जैसे कोई
जादूगर आया।

धरी धरा ने पीत ओढ़नी।
मुग्ध हो रहे मोर-मोरनी।
डाल-पात सब गीत-गीत हैं।
प्रीत-प्रीत हैं कंत-कामिनी।

हुलस हृदय ले रही हिलोरें।
हर मन अकुलाया।     

-कल्पना रामानी

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