रचना चोरों की शामत

Wednesday, 29 January 2014

दिवस हो चले कोमल कोमल





















सर्द हवा ने बिस्तर बाँधा
दिवस हो चले कोमल कोमल।
सूरज ने कुहरे को निगला।
ताप बढ़ा, कुछ पारा उछला।
हिमगिरि पिघले, सागर सँभले
निरख नदी, बढ़ चली चंचला।
 
खुली धूप से खिलीं वादियाँ
लगे झूमने निर्झर कल-कल।
 
 नगमें सुना रही फुलवारी
 गूँज उठी भोली किलकारी
 खिलती कलियाँ देख-देखकर
 भँवरों पर छा गई खुमारी।
 
देख तितलियाँ, उड़ती चिड़ियाँ
मुस्कानों से महक रहे पल।
 
अमराई जो कल तक पल-छिन
काट रही थी बनकर जोगन
मौसम के इस नए रूप से
आतुर है बनने को दुल्हन।
 
नाच रहे उसके मन आँगन

मोर, पपीहे, कोयल, बुलबुल।

-कल्पना रामानी    

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