रचना चोरों की शामत

Wednesday, 15 January 2014

तनहाई तुम क्यों आई


तनहाई, तुम इस जीवन में
बिना बुलाए आई क्यों?
मन तो मन के साथ-साथ था
तुमने सेंध लगाई क्यों?

क्या तुम इतना नहीं जानती
साथ सुहानी कुदरत है।
खिलती कलियाँ, हँसता गुलशन
फूल पात हैं, जल कण हैं।
महक हवा की साथ साथ थी
तूफाँ बनकर आई क्यों?

किसने कहा अकेले हैं हम।
कैसे तुमने मान लिया?
ढलता सूरज, झुकता अम्बर
नौका सागर सब कुछ था।
अंतर्घट यह भरा हुआ था
अगम रिक्तता लाई क्यों?

वापस जाओ, इस जीवन में
तेरी कोई जगह नहीं।
सब कुछ छोड़, तुझे अपनाऊँ
दिखती कोई वजह नहीं।
स्वर्ग सृष्टि का छोड़ तुम्हारी
बनूँ आज परछाईं क्यों?

-कल्पना रामानी

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

Followers

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"
संपर्क-अंजुमन प्रकाशन/ई मेल anjumanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब मेरी ओर से सिर्फ आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com-

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"
संपर्क-अयन प्रकाशन ई मेल-ayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"
संपर्क- अयन प्रकाशन-ई मेल ayanayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क -- kalpanasramani@gmail.com

मेरी प्रकाशित ई बुक

पुरस्कार/सम्मान

पुरस्कार/सम्मान
मेरे प्रथम नवगीत संग्रह "हौसलों के पंख" के लिए पूर्णिमा जी द्वारा नवांकुर पुरस्कार/सम्मान ग्रहण करते हुए