रचना चोरों की शामत

Wednesday, 7 November 2012

गाँवों में बस गीत रह गए

 










ऊँचे पद के मद में जिनके
शहर चल दिये पाँव
नहीं चाहते कभी लौटना
वापस अपने गाँव।
 
याद नहीं अब गाँव उन्हें जो
होते उनके जन्में 
फिर आने की मात-पिता को
देकर जाते कसमें।
नहीं लुभातीं आज उन्हें वो
धूल सँजोई गलियाँ। 
और नहीं आसान छोडना
शहरों की रंगरलियाँ।
छोड़ चमाचम गाड़ी कैसे
चलें गली में पाँव।
 
फैशन भूल नए शहरों के
तितली सी बहुरानी। 
भिनसारे उठ भर पाएगी
क्या वो नल से पानी?
शापिंग माल, शार्ट पहनावा
सजी-धजी गुड़िया सी। 
कैसे जाए गाँव दुल्हनियाँ
बनकर छुई-मुई सी।
किटी पार्टियों की आदी क्यों
दाबे बूढ़े पाँव।
 
छोटे फ्लैट, मगर सुंदर हैं
टाउनशिप की बातें।
कामकाज में दिन कटते हैं
रंगबिरंगी रातें।
क्लब हाउस हैं, तरणताल हैं
सजी हुई फुलवारी। 
भूल गए रिश्ते नातों की
परिभाषाएँ सारी।
अब तो गीत बचे  गाँवों में
बचा गीत में गाँव।


-कल्पना रामानी

6 comments:

Suman Dubey said...

bdhiya kalpana ji sundar

Shoonya Akankshi said...

"अब तो गीत बचे गांवों में,
बचा गीत में गाँव"

यूँ तो पूरा गीत ही बहुत अच्छा है कल्पना रामानी जी, परन्तु उपरोक्त पंक्तियों का तो कहना ही क्या है! बहुत प्यारी बन पड़ी हैं।
- शून्य आकांक्षी

संध्या सिंह said...

बहुत सुन्दर कहानी .....अंतिम पंक्ति तो शानदार बनी है .....एक सार्थक सफल गीत हेतु बधाई कल्पना जी

Mukul Kumari Amlas said...

अति सुंदर ।

Mukul Kumari Amlas said...

अति सुंदर ।

Mukul Kumari Amlas said...

अति सुंदर ।

पुनः पधारिए


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