रचना चोरों की शामत

Wednesday, 8 January 2014

महका- महका

 








युग बीते, कई सदियाँ गईं,
पर कुदरत के हैं नियम वही।
क्यों मनुष तुम्हारा मन बहका?
क्यों कर्म नहीं महका-महका।
 
बादल ने बाँधा बूँदों को,
जब बरसे जग को प्राण मिले।
है धूप धरोहर सूरज की,
झाँके कष्टों से त्राण मिले,
कुदरत से सब पाया तुमने,
अनगिनत तुम्हें वरदान मिले।
 
क्या तुमने मान किया उनका?
क्यों ज्ञान नहीं महका-महका।
 
तरुवर सब देते फल छाया,
धरती करती पोषण सबका।
जल स्रोत बुझाते प्यास सभी,
विधु, तारों संग तमस हरता।
तुम सिर्फ स्वार्थी हो मानव,
परिचय केवल शोषणकर्ता।
 
क्या अर्थ अरे! इस वैभव का,
क्यों भाव नहीं महका-महका।
 
कितने घर हैं बर्बाद किए?
क्या फिर भी तुम आबाद हुए?
कुछ दिया नहीं छीना सबसे
क्या हवस मिटी, अवसाद गए?
क्या नाम तुम्हें दें तुम्हीं कहो
तुम कंस हुए, सैय्याद हुए।
 
जब जन्म लिया है मानुष का
क्यों मर्म नहीं महका-महका।

-कल्पना रामानी  

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