रचना चोरों की शामत

Sunday, 22 July 2012

फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ









फूल तुम्हें मैं कहाँ सजाऊँ?
जहाँ सदा मुस्काता पाऊँ।
सोचूँ यही।


तुम्हें चढ़ाऊँ देव चरण में
बाद प्रवाहित कर दूँ जल में।
गलकर होगा अंत तुम्हारा
पानी दूषित होगा पल में।

ना, ना, नहीं।
 
सुंदरता के कदम तले गर
तुम्हें सजाऊँ सुमन, बिछाकर।
कुचल जाय सौंदर्य तुम्हारा
होगा यह अपमान सरासर।

बिलकुल  नहीं।
 
गजरे में जो करूँ सुशोभित
महतों का माला से स्वागत।
मगर सुमन, मैं नहीं चाहती
फेंके जाओ बनो तिरस्कृत।

ऊँ हूँ... नहीं।
 
यदि फैलाऊँ वीरों के पथ
घनी धूल से होगे लथपथ।
हश्र तुम्हारा देख देख कर
वीरों का मन होगा विचलित।

उफ्फ़ोह! नहीं।
 
तुम तो बने रहो बगिया में
महको इस सुंदर दुनियाँ में।
वंश बढ़ाओ, परिवर्धित हो
शुद्ध हवाएँ बहें फिजा में।

चाहूँ यही।

-कल्पना रामानी

2 comments:

surenderpal vaidya said...

सुन्दरता के कदम तले गर,
तुझे सजाऊं सुमन बिछाकर ।
कुचल जाय सौंदर्य तुम्हारा,
होगा यह अपमान सरासर ।
बिल्कुल नहीँ !
बहूत सुन्दर भावपूर्ण रचना ।

वीरेश अरोड़ा said...

यदि फैलाऊँ वीरों के पथ,
घनी धूल से होगे लथपथ।
हश्र तुम्हारा देख देख कर,
वीरों का मन होगा विचलित।
उफ्फ़ोह! नहीं। ...........
वाह बहुत सुंदर कल्पना जी .... बधाई.

पुनः पधारिए


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