रचना चोरों की शामत

Thursday, 5 April 2012

जीवन संध्या




जो पल कल मैं, हार चुकी थी,
आज उन्हें फिर जीत रही हूँ।
बचपन मुझको बुला रहा है,
मैं बचपन की मीत बनी हूँ।
 
टूट चुके थे सभी किनारे।
बिखर गए थे जीवन धारे।  
तूफानों में घिरी अस्मिता,
शेष निशाँ ही बने सहारे।
निर्झरिणी सी बहते बहते
तटबंधों में फिर पहुँची हूँ।
 
पत्ते झड़ गए शाखें टूटीं,
मगर जड़ों ने साथ न छोड़ा।
उम्मीदों की इक बदली ने,
अमृत जल से जीवन जोड़ा।
सावन मुझको बुला रहा है,
फिर पतझड़ को सींच रही हूँ।
 
राग नए हैं साज पुराना,
बन सकता है मधुर  तराना।
जो न बना सरगम का साथी,
उसने क्या जीवन पहचाना।
सुर का सागर बुला रहा है,
काव्य रसों से भीग रही हूँ।
 
जीवन संध्या खड़ी द्वार पर,
लेकिन रात अभी है बाकी।
चाँद सितारे होंगे सारे,
तम हरने को मेरे साथी।
पल-पल मुझको सिखा रहा है,
मैं हर पल से सीख रही हूँ।
"हौसलों के पंख" से
 
--------कल्पना रामानी       
 
 

 

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