रचना चोरों की शामत

Tuesday, 24 March 2015

घड़ा देखकर प्यासा कौवा

 
घड़ा
देखकर
प्यासा कौवा
चला चोंच में लेके पत्थर

वो क्या जाने, पानी वाला
पुराकाल अब बीत चुका है
जो घट अर्ध-भरा होता था
अब पूरा ही रीत चुका है

इस-युग
बेच रही है
बोतल, गली-गली
जल   सील-बंद  कर

ओस चाटकर सोई बगिया
तितली भटक रही है प्यासी
औंधा बर्तन, बिखरे दाने
देख चिड़ी भी हुई रुआँसी

बच्चों
का मुँह खुला
देखकर चुगा रही
नम खुरचन चुनकर

पशु-पक्षी सब सोच रहे हैं
क्यों जलहीन हुआ जग सारा
सबक सिखाएँ इस मानव को
जिसने सोखा हलक हमारा

काल
अनिश्चित
को बैठे सब, ताल
किनारे हैं अनशन पर 

-कल्पना रामानी 

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

Followers

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह"हौसलों के पंख"
संपर्क-अंजुमन प्रकाशन/ई मेल anjumanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब मेरी ओर से सिर्फ आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com-

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"

मेरा प्रकाशित नवगीत संग्रह "खेतों ने ख़त लिखा"
संपर्क-अयन प्रकाशन ई मेल-ayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क- kalpanasramani@gmail.com

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"

मेरा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी"
संपर्क- अयन प्रकाशन-ई मेल ayanayanprakashan@gmail.com/मित्रों के लिए यह किताब आधी कीमत पर उपलब्ध है। संपर्क -- kalpanasramani@gmail.com

मेरी प्रकाशित ई बुक

पुरस्कार/सम्मान

पुरस्कार/सम्मान
मेरे प्रथम नवगीत संग्रह "हौसलों के पंख" के लिए पूर्णिमा जी द्वारा नवांकुर पुरस्कार/सम्मान ग्रहण करते हुए