रचना चोरों की शामत

Monday, 16 March 2015

रधिया ने नवगीत रचा

दिनचर्या के गुणा-भाग से
रधिया ने नवगीत
रचा।

जाग, जगा प्रातः तारे को
प्रथम सँभाली कर्म-कलम
भरी विचारों की स्याही
चल पड़ी उठा लयबद्ध कदम

लेखा-जोखा घर-घर का था
रहा हृदय में द्वंद्व
मचा।   

श्रम बूँदों के रहे बिगड़ते-
बनते चित्र कवित्त भरे
अक्षर-अक्षर रही जोड़ती
रधिया रानी धीर धरे

धार-धार धुलते भांडों पर
दो हाथों को नचा-
नचा।

ढला दिवस, खींची लकीर
पर गीत अधूरा है तब तक
जोड़-तोड़ कर पूरा होगा
घर का गणित नहीं जब तक

लिख देगी अब रात नींद ही
जो कुछ भी है शेष
बचा।  

-कल्पना रामानी 

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