रचना चोरों की शामत

Sunday, 30 March 2014

गीत कोकिला गाती रहना



बने रहें ये दिन बसंत के
गीत कोकिला गाती
रहना।
 
मंथर होती गति जीवन की
नई उमंगों से भर जाती।
कुंद जड़ें भी होतीं स्पंदित
वसुधा मंद-मंद मुसकाती।
 
देखो जोग न ले अमराई
उससे प्रीत जताती
रहना।
 
बोल तुम्हारे सखी घोलते
जग में अमृत-रस की धारा।
प्रेम-नगर बन जाती जगती
समय ठहर जाता बंजारा।
 
झाँक सकें ना ज्यों अँधियारे
तुम प्रकाश बन आती
रहना।
 
जब फागुन के रंग उतरकर
होली जन-जन संग मनाएँ।
मिलकर सारे सुमन प्राणियों
के मन स्नेहिल भाव जगाएँ।
 
तब तुम अपनी कूक-कूक से
जय उद्घोष गुँजाती
रहना।

-कल्पना रामानी

1 comment:

Dr. Indu Nautiyal said...



सुन्दर, मधुर रचना .प्रशंसनीय भावाभिव्यक्ति .

पुनः पधारिए


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