रचना चोरों की शामत

Saturday, 31 August 2013

माँ! तू कहाँ है माँ!















माँ, तू कहाँ है माँ!
है कौन
मुझसे छीनकर
तुझे ले गया कहाँ?
 
बरसों के बंध तोड़
एक पल में चल पड़ी।
अनजान पथ अकेली
किस तरह निकल पड़ी।
क्या प्यार कम था मेरा
या और गम यहाँ?
 
पाई जो लोरियों से
निंदिया वो छोड़ गई।
तेरी गोद में सुनी थी
वो कहानी खो गई। 
गुम हो गया वो आँचल
बचपन छुपा जहाँ
 
है धूल से सना कुछ     
सामान तेरा बाकी
कुछ रह गया अधूरा
अरमान तेरा बाकी
बाक़ी हैं तेरे कदमों
के आखिरी निशाँ।
 
कमरे से झाँकती हैं
धुँधली सी तेरी यादें।
कोने में कैद तेरी
कविताओं की किताबें।
कब तक सँभालूँ सब कुछ
समझा दे मेरी माँ!


-कल्पना रामानी

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