रचना चोरों की शामत

Thursday, 23 May 2013

छाँव निगलकर हँसता सूरज



 छाँव निगलकर हँसता सूरज,
उगल रहा है धूप।

शीतलता को रखा कैद में,
गर्मी लाया साथ।
तप्त दुपहरी रानी बनकर,
बाँट रही सौगात।
फ्रूट-चाट, कुल्फी, ठंडाई,
सभी सुहाने रूप।

रातें छोटी दिन हैं लंबे,
लू का बढ़ा प्रकोप।
घने पेड़ भी तपे आग से,
शीत हवा का लोप।
चीं चीं, चूँ चूँ, काँव  काँव सब,
ढूंढ रहे नल कूप।

सड़क किनारे ठेले वाले,
राहत लिए खड़े।
जन-जन के तर कंठ कर रहे,
जल से भरे घड़े।
दही,शिकंजी,जूस देखकर,
भाग छिपा है सूप।

तपी हुई राहें पथिकों के,
झुलसाती जब पाँव।
सुख-पड़ाव बन जाती है तब,
गुलमोहर की छाँव।
गुल-गुच्छों के छत्र तले सब।
बने हुए हैं भूप।

---कल्पना रामानी

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