रचना चोरों की शामत

Saturday, 6 February 2016

क्या कभी सोचा?

क्या कभी सोचा कि चाहें
गीत क्या विद्वान से

आजकल ये सुप्त रहते
हैं अँधेरों में सिमटकर
क्योंकि मुखड़ा देख, इनका
जन चले जाते पलटकर  

और कर जाते विभूषित  
नित नए उपमान से

अंग कोई भंग करता
कोई रस ही चूस लेता  
दाद खुद को दे सृजक फिर
नव-सृजन का नाम देता  

गीत अदना सा भला कैसे
भिड़े इंसान से

भाव, भाषा, छंद, रस-लय  
साथ सब ये गीत माँगें 
ज्यों तरंगित हो उठें मन
और तन के रोम जागें

नव-पुरा का हो मिलन पर
शब्द हों आसान से     

-कल्पना रामानी 

1 comment:

santosh kumar prajapati said...

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीय जी

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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