रचना चोरों की शामत

Friday, 19 September 2014

जंगलों में


सोच में डूबा हुआ मन
जब उतरता जंगलों में।
वे हरे जीवन भरे दिन
याद करता जंगलों में।
 
कल जहाँ तरुवर खड़े थे
ठूँठ दिखते उस जगह।
रात रहती है वहाँ केवल
नहीं होती सुबह।
 
और कोई एक दीपक
भी न धरता जंगलों में।
 
घर से ले जातीं मुझे थीं
जो वहाँ पगडंडियाँ।
अब चुरातीं हैं नज़र
कैसे करें हालत बयाँ
 
जानती हूँ मैं मगर,
हर प्राण डरता जंगलों में।
 
देखती थी मुग्ध हरियल
पेड़ लहराते हुए।
स्वर्ण आभा प्रात की
साँझ गहराते हुए।
 
क्या हसीं मोहक नज़ारा
था उभरता जंगलों में।
 
अब कहाँ प्यारे परिंदे  
वनचरों का कारवाँ।  
निर्दयी हाथों ने जिनका
रौंद डाला आशियाँ।
 
खौफ ही बेखौफ होकर
अब विचरता जंगलों में। 

-कल्पना रामानी

1 comment:

Rajeev Upadhyay said...

बहुत ही सुन्दर गीत जो वन की दशा एवं व्यथा को अंकित कर रही है। स्वयं शून्य

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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